स्वर्ग की ख्वाहिश.. आ ज मैं स्वर्ग जाने की तैयारी कर रहा था। तभी अचानक अकस्मात आसमान गरजने लगा और आकाशवाणी हुई, "रूको वत्स..! तुम्हारा ये प्रयोजन व्यर्थ है..।" मैं थोड़ा अचंभित हुआ। "आखिर ये आवाज़ कहां से आ रही है", मैं मन में हीं सोच रहा था, तभी मेरा ध्यान आसमान से आते तेज़ एवं तीव्र प्रकाश की ओर गई। मैंने गौर किया कि वह तीव्र प्रभावी गर्जन सा महसूस होने वाली आवाज़ें भी उधर से हीं आ रही थी। मैं थोड़ा सहमा। फिर मैंने महसूस किया कि मेरे मन में इस प्रश्न का जवाब पाने की आकांक्षा जग रही है। मैंने आसमान की ओर सर करते हुए पुछा, "आखिर क्यों..? क्या मैंने कोई दुष्कर्म किया है या प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष किसी को चोट पहुंचाया है..?" तभी आसमान से जवाब आया,"नहीं वत्स! तुमने इनमें से कुछ भी ग़लत कार्य नहीं किया है। न हीं तुमने कभी किसी के साथ दुष्कर्म किया है और न हीं किसी को चोट पहुंचाया है। बल्कि तुमने तो सदैव मानव हित के लिए कार्य किया है। लोगों के बीच के जाति-धर्म के भेद और मतभेद को खत्म किए हैं और उन्हें एक साथ घुल-मिल कर जीना सिखालाया है। समाज में स...
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Mr. Vishnudeva
इस बार आकाशदेव पूरी प्रसन्नता के साथ बोले,"धन्य है यह राष्ट्र और माता-पिता पूत्र! जहां और जिन्होंने तुम जैसे स्वाभीमानी पुत्र का जन्म दिया। आज तुम इस श्रृष्टि के सत्य से परिचित हो गए कि मानव धर्म हीं सर्वश्रेष्ठ धर्म है और कर्म के सत्य से भी परिचित हो गए कि बिना किए कुछ नहीं मिलता है। परंतु कर्म करने से नहीं पाप होता है और न हीं पुण्य बल्कि जैसा काम किया जाता है, उसका तुरंत हीं वैसा परिणाम मिलता है। आज तुमने जीवन के श्रेष्ठ पद 'मनुष्यतव' को प्राप्त कर लिया है।"